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सरसों की खेती

परिचय

सरसों का रबी की तिलहनी फसलो में एक प्रमुख स्थान है, सरसों की खेती सीमित सिचाई की दशा में भी अधिक लाभदायक फसल है, सरसों की फसल के लिए उन्नत विधियाँ अपनाने से उत्पादन एवं उत्पादकता में बहुत ही वृद्धि होती हैI

प्रजातियाँ

सरसों की उन्नतशील प्रजातियाँ कौन कौन सी हैं ?
राई या सरसों के लिए बोई जाने वाली उन्नतशील प्रजातियाँ जैसे क्रांति, माया, वरुणा, इसे हम टी-59 भी कहते है, पूसा बोल्ड, उर्वशी, तथा नरेन्द्र राई, प्रजातियाँ की बुवाई सिंचित दशा में की जाती है तथा असिंचित दशा में बोई जाने वाली सरसों कीप्रजातियाँ जैसे की वरुणा, वैभव तथा वरदान, इत्यादि प्रजातियाँ को बवाई करना चाहिएI

उपयुक्त भूमि

सरसों की खेती के लिए किस प्रकार की जलवायु और भूमि की आवश्यकता होती है?
सरसों की फसल के लिए 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान होना चाहिए, सरसों की फसल के लिए दोमट भूमि सर्वोतम होती है, जिसमे की जल निकास उचित प्रबन्ध होना चाहिएI

खेत की तैयारी

सरसों की खेती के लिए हम भूमि की तैयारी किस तरह से करें?
सरसों की खेती के लिए खेत की तैयारी सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए, इसके पश्चात दो से तीन जुताईयाँ देशी हल या कल्टीवेटर से करना चाहिए, इसकी जुताई करने के पश्चात पाटा लगा कर खेत को समतल करना अति आवश्यक हैंI

बीज बुवाई

सरसों की बीज दर प्रति हैक्टर कितनी मात्रा में होनी चाहिए?
सिंचित क्षेत्रो में सरसों की फसल की बुवाई के लिए 5 से 6 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टर के दर से प्रयोग करना चाहिएI
सरसों के बीज की बुवाई से पूर्व बीजो का शोधन किस तरह से करें?
सरसों की फसल के लिए बीज जनित रोगों की सुरक्षा हेतु 2 से 5 ग्राम थीरम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिएI
सरसों के बीज की बुवाई के लिए उपयुक्त समय क्या है, यह कैसे निर्धारित करें?
सरसों की बुवाई का उपयुक्त समय सितम्बर के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के प्रथम सप्ताह तक है, सरसों की बुवाई देशी हल के पीछे 5 से 6 सेंटी मीटर गहरे कूडो में 45 सेंटी मीटर की दूरी पर  करना चाहिएI

जल प्रबंधन

सरसों की फसल में सिचाई का सही समय क्या है?
सरसों की फसल में पहली सिचाई फूल आने के समय तथा दूसरी सिचाई फलियाँ में दाने भरने की अवस्था में करना चाहिए, यदि जाड़े में वर्षा हो जाती है, तो दूसरी सिचाई न भी करें तो उपज अच्छी प्राप्त हो जाती हैI

पोषण प्रबंधन

सरसों की फसल में खाद और उर्वरको का प्रयोग हमे कब करना चाहिए, और कैसे करना चाहिए?
सरसों की खेती के लिए 60 कुन्तल गोबर की सड़ी हुई खाद को बुवाई से पूर्व अंतिम जुताई के समय खेत में मिला देना चाहिए तथा सिंचित दशा में 120 किलोग्राम  नत्रजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस तथा 60 किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करते हैं, नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई से पहले, अंतिम जुताई के समय खेत में मिला देना चाहिए, शेष आधी नाइट्रोजन की मात्रा बुवाई के 25 से 30 दिन बाद टापड्रेसिग रूप में प्रयोग करना चाहिएI

खरपतवार प्रबंधन

खरपतवार का नियत्रण सरसों की फसल में हम कैसे करें?
सरसों की खेती में बुवाई के 15 से 20 दिन बाद घने पौधों को निकाल कर उनकी आपसी दूरी 15 सेन्टीमीटर कर देनी चाहिए, खरपतवार नष्ट करने के लिए एक निराई गुड़ाई सिचाई के पहले और दूसरी सिचाई के बाद करें, रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए पेंडामेथालिन 30 ई.सी. रसायन की 3.3 लीटर मात्रा को प्रति हैक्टर की दर से 800 से 1000 लीटर पानी में घोल कर छिडकाव करना चाहिए, बुवाई के 2-3 दिन अंतर पर यह छिडकाव करना अति आवश्यक हैI

रोग प्रबंधन

 सरसों की फसल में लगने वाले रोगों का नियंत्रण किस तरह से करें?
सरसों की फसल में प्रमुख रोग जैसे आल्टरनेरिया, पत्ती झुलसा रोग, सफ़ेद किट्ट रोग, चूणिल आसिता रोग तथा तुलासिता रोग फसल में लगते है, इन रोगों के नियत्रण के लिए मेन्कोजेब 75 प्रतिशत नामक रसायन को 800-1000 लीटर पानी में मिलकर छिडकाव करना चाहिएI

कीट प्रबंधन

सरसों की फसल में कीट लग जाते है, उनकी रोकथाम किस तरह से करें?
सरसों में कीट अलग अलग तरह के होते -
सरसों की आरा मक्खी यह काले रंग की घरेलु मक्खी से छोटी होती है, मादा का अंडा रोपण आरी के आकार का होने के कारण इसे आरा मक्खी कहते हैं, इस कीट की सुड़ियाँ पत्तियों के किनारे पर छेद बनती है और बहुत तेजी से खाती है, इसके नियत्रण के लिए मैलाथियान 50 ई.सी. 1.5 लीटर को 700 से 800 लीटर पानी में घोल कर छिडकाव करना चाहिएI
चित्रित कीट इस कीट के प्रौढ़ तथा शिशु अपने चूसने वाले मुखंगो को पौधों की कोमल पत्तियों, शाखाओ, फूलो, तनो, तथा फलियों के रस चूसते है, इसका आक्रमण अक्टूबर से फसल कटने तक कभी भी हो सकता है, इसके नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट 30 ई.सी. 1 लीटर या फेंटोथियान 50 ई.सी. 1.5 लीटर मात्रा को 700 से 800 लीटर पानी में घोल कर छिडकाव करना चाहिएI
माहू की सबसे बड़ी समस्या है, यह पंखहीन तथा पंख युक्त हल्के सिलेटी या हरे रंग का कीट होता है, इस कीट के प्रौढ़ तथा शिशु पौधों के कोमल तनो, पत्तियों, फूलो एवम नयी फलियों के रस चूसते है, इस कीट का प्रकोप दिसंबर से मार्च तक रहता है, इसके नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट 30 ई.सी. 1 लीटर फेंटोथियान 50 ई.सी. 1 लीटर मात्रा को 700 से 800 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करना अति आवश्यक हैंI

फसल कटाई

सरसों की फसल की कटाई का उपयुक्त समय क्या है और इसका भण्डारण किस तरह से करें?
सरसों की फसल में जब 75% फलियाँ सुनहरे रंग की हो जाए, तब फसल को काटकर, सुखाकर या मड़ाई करके बीज अलग कर लेना चाहिए, सरसों के बीज को अच्छी तरह सुखाकर ही भण्डारण करना चाहिएI

पैदावार

सरसों की फसल से प्रति हैक्टर कितनी उपज प्राप्त कर सकते हैं?

असिंचित क्षेत्रो में इसकी पैदावार 20 से 25 कुन्तल तक तथा सिंचित क्षेत्रो में 25 से 30 कुन्तल प्रति हैक्टर तक प्राप्त हो जाती हैंI

मूंगफली की ेती



परिचय

मूंगफली खरीफ एवं जायद दोनों मौसम की फसल हैI खरीफ की मुख्य तिलहनी फसल है, यह वायु तथा वर्षा द्वारा भूमि कटने से बचाती हैI इसमे प्रोटीन 22 से 28% कार्बोहाइड्रेट 10 से 12% तथा वसा 48 से 50% पाई जाती है, यह मुख्यता झाँसी, हरदोई, सीतापुर, खीरी, उन्नाव, बरेली, बदायूं, एटा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, मुरादाबाद, एवं सहारनपुर के अधिक क्षेत्रफल में उगाई जाती हैI अधिक वर्षा होने के कारण खरीफ में उत्पादन कम हो गया है, और ग्रीष्म अर्थात जायद में इसका उत्पादन बढ़ता जा रहा हैI

उपयुक्त भूमि

मूंगफली की खेती के लिए किस प्रकार की जलवायु और भूमि की आवश्यकता होती है?
मूंगफली की खेती खरीफ एवं जायद दोनों मौसम की जाती हैI जहाँ पर अधिक वर्षा होती है, वहां पर खास कर जायद में ही खेती हो रही है, इसके लिए शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है, मूंगफली की खेती के लिए दोमट बलुअर, बलुअर दोमट या हल्की दोमट भूमि अच्छी रहती है, जायद में मूंगफली की फसल के लिए भरी दोमट भूमि का चुनाव नहीं करना चाहिएI यह आलू, मटर, सब्जी मटर, एवं राई की कटाई के बाद खाली भूमि में सफलता पूर्वक की जा सकती हैI

प्रजातियाँ

कौन सी उन्नतशील प्रजातियाँ है, जिनका इस्तेमाल हमें मूंगफली की खेती में करना चाहिए?
खरीफ एवं जायद की अलग अलग प्रजातियाँ पायी जाती है, खरीफ के लिए प्रजातियाँ - चन्द्रा, चित्रा, कौशल, प्रकाश, अम्बर, उत्कर्ष, टाइप-64, टाइप-28 एवं टी.जी.37 ए. है, ये खरीफ में उत्पादन के लिए उत्तम पाई जाती हैI इसी प्रकार से जायद के लिए जो प्रजातियाँ है- डी.एच.-86,आई.सी.जी.एस-44,आई.सी.जी.एस.-1,आर-9251,टी.जी.37ए.,आर-8808 ये प्रजातियाँ सफलतापूर्वक इस समय जायद के फसल में उगाई जा रही हैI

खेत की तैयारी

मूंगफली की खेती में किस तरह से अपने खेतो की तैयारी करे ?
जायद में मूंगफली की खेती हेतु खेत की तैयारी अच्छी तरह करनी चाहिएI यदि मटर या राई की कटाई के बाद खेती की जा रही है, तो उन खेतो की एक गहरी जुताई के बाद दो-तीन जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करके भुरभुरा बना लेना चाहिएI जायद में आखिरी जुताई के बाद पाटा लगा कर खेत को समतल बना लेना चाहिएI जिससे की पानी लगाने में सुविधा रहे और सभी जगह पानी सफलता से लगाया जा सकेI

बीज बुवाई

मूंगफली की फसल की बुवाई कब और किस विधि से करना चाहिए?
खरीफ में बुवाई 20 जून से 15 जुलाई तक अवश्य कर लेना चाहिए तथा खरीफ में लाइन से लाइन बुवाई की दूरी 40 से 45 सेमी० एवं पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेमी० रखनी चाहिए, इसी प्रकार से जायद में बुवाई 5 मार्च से 10 मार्च तक अवश्य कर लेना चाहिए, जिससे की फसल अच्छी पैदावार दे सकेI बुवाई लाइनों में करना चाहिए, लाइन से लाइन की दूरी 25 से 30 सेमी० एवं पौधे से पौधे की दूरी 8 से 10 सेमी० रखनी चाहिएI
मूंगफली की बुवाई में बीज की मात्रा प्रति हैक्टर कितनी डालनी चाहिए और बीजो का शोधन हमारे किसान भाई किस प्रकार करे?
मौसम के आधार पर बीज की मात्रा अलग अलग रहती है, खरीफ की फसल में 90-95 किग्रा प्रति हैक्टर बुवाई में लगता है, जायद की फसल में 95-100 किग्रा प्रति हैक्टर बीज बुवाई में लगता हैं बोने से पहले बीज (गिरी) को थीरम 2 ग्राम और 1 ग्राम 50% कार्बेन्डाजिम के मिश्रण को 2 ग्राम प्रति किग्रा० बीज की दर से शोधित करना चाहिएI अथवा 1.5 ग्राम थायोफिनेटमिथाइल प्रति किग्रा बीज की दर से शोधित करना चाहिए, इस शोधन के 5-6 घण्टे बाद बोने से पहले बीज को मूंगफली के विशिष्ट राइजोवियम कल्चर से उपचारित कर लेना चाहिए, एक पैकेट 250 ग्राम का कल्चर 10 किग्रा बीज के लिए प्रर्याप्त होता है आधा लीटर पानी एवं 50 ग्राम गुड को घोलकर कल्चर में मिलकर 10 किग्रा बीज में मिला देना चाहिए, इस तरह उपचारित करके के बाद बीज को 2-3 घण्टे सूखाकर, बीज की बुवाई सुबह 10 बजे से पहले या 4 बजे के बाद करनी चाहिएI

पोषण प्रबंधन

उर्वरको का प्रयोग कितनी मात्रा में करना चाहिए और कब करना चाहिए?
यदि जायद की फसल के बाद मूगंफली की खेती की जा रही हो तो 100 से 150 कुन्तल सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद खेत की तैयारी करते समय आखिरी जुताई में डालकर अच्छी तरह से मिला देना चाहिए, लेकिन फिर भी 20 किलो ग्राम नत्रजन 30 किलो फास्फोरस तथा 45 किलो पोटाश तत्व के रूप में तथा 300 किलोग्राम प्रति हैक्टर जिप्सम डालना अति आवश्यक है, नत्रजन फास्फोरस एवम पोटाश की पूरी मात्रा तथा जिप्सम की आधी मात्रा वुवाई के समय कुडो में बीज के नीचे 2-3 सेमी० गहराई पर चोंगा या नाई से डालना चाहिए, जिप्सम की शेष आधी मात्रा मूंगफली में फूल आने की अवस्था में ट्रापड्रेसिग के रूप में डालना चाहिए ट्रापड्रेसिग द्वारा जिप्सम देने के बाद खुरपी से खेत में मिला देना चाहिएI

जल प्रबंधन

मूंगफली की फसल में सिचाई कितनी करनी चाहिए और कब-कब करनी चाहिए?
खरीफ की फसल में वर्षा न होने पर दो सिचाईयां करना आवश्यक है, पहली खुटियाँ (पेगिंग) बनाते समय तथा दूसरी फली बनाते समय करना चाहिएI जब की जायद की फसल में 4-5 सिचाई करना अति आवश्यक हैI पहली सिचाई जमाव पूर्ण होने पर और सुखी गुड़ाई के 20 दिन बाद दूसरी सिचाई 35 दिन बाद तीसरी सिचाई 50 से 55 दिन बाद कहती पेगिंग बनने पर साथ ही हर समय नमी रहने हेतु गहरी सिचाई करनी चाहिएI चौथी सिचाई फलियाँ बनते समय 70-75 दिन बाद तथा पाचवी सिचाई दाना बनने के बाद दाना भरते समय करना अति आवश्यक हैI

खरपतवार प्रबंधन

मूंगफली की फसल के लिए खेतो की निराई गुड़ाई कब करना चाहिए और खरपतवार का नियंत्रण किस प्रकार करे?
बुवाई के 15 दिन बाद पहली एवम बुवाई के 35 दिन बाद दूसरी तथा जिप्सम बुरकाव के बाद अवश्य है की निराई-गुडाई करें खुटियाँ (पेगिंग) बनते समय निराई -गुड़ाई नहीं करना चाहिएI साथ ही खरपतवार भी नियंत्रण अति आवश्यक हैंI अच्छी पैदावार लेने के लिए निराई-गुडाई, खरपतवार निकलना बहुत ही आवश्यक हैI रसायनों द्वारा खरपतवार नियंत्रण हेतु पेंडीमिथिलिन 30 ई सी की 3.3 लीटर या एलाक्लोर 50 ई सी की 4 लीटर मात्रा प्रति हैक्टर की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 2-3 दिन तक तथा बीज जमाव से पहले छिडकाव करना अति आवश्यक हैंI इससे खरपतवारो का जमाव नहीं होता हैI

रोग प्रबंधन

मूंगफली की खेती में कौन कौन से रोग लगते हैं, एवं उनका नियंत्रण हमें किस प्रकार करना चाहिए?
मूंगफली में कई रोग लगते हैंI जैसे क्राउन राट, डाई रूट या चार कोल राट, बड नेक्रोसिस एवं टिक्का रोग है, रोकथाम के लिए डाईमेथोएट 30 ई. सी. एक लीटर प्रति हैक्टर की दर से छिडकाव करना चाहिएI इसके अलावा जिनेब 75% घुलनशील चूर्ण 2.5 किग्रा अथवा जीरम 27% तरल तीन लीटर प्रति हैक्टर की दर से 2-3 छिडकाव 10 दिन के अन्तराल पर करना चाहिएI

कीट प्रबंधन

मूंगफली की खेती में कौन-कौन से कीट लगते हैं और उनका नियंत्रण हमें किस प्रकार करना चाहिए?
मूंगफली की खेती में कई कीट लगते हैंI जैसे सफ़ेद गिडार, दीमक, हेयरी कैटरपिलर जैसिड एवं फलीवेधक है फलीवेधक एवम अन्य कीटों की रोकथाम के लिए बुवाई के पूर्व में लिन्डेन 1.3% चूर्ण को 25 से 30 किग्रा अथवा सेबीडाल दानेदार 20 से 25 किग्रा प्रति हेक्टर की दर से मिटटी में मिलाना चाहिए फोरेट 10 जी को को 20 से 25 किग्रा प्रति हैक्टर की दर से बुवाई के समय कुडो में डालना चाहिएI दीमक के प्रकोप को रोकने के लिए क्लोरपायरिफास या क्यूनालफास 20 ई. सी. की 4 लीटर मात्रा प्रति हैक्टर की दर से सिचाई के पानी के साथ प्रयोग करनी चाहिएI

फसल कटाई

मूंगफली की फसल की खुदाई कब और किस प्रकार करनी चाहिए?
खुदाई तभी फसल की करनी चाहिए जब मूंगफली के छिलके के ऊपर नसे उभर आवे तथा भीतर का भाग कत्थई रंग का हो जाये और मूंगफली का दाना गुलाबी रंग का हो जाये उसी समय खुदाई करनी चाहिए खुदाई करते समय ध्यान रहे की पौधा सीधा रखे पलट कर कड़ी धुप में नहीं रखना चाहिएI अहम् बात यह है कि 70 से 80% फलियाँ पकाने के बाद ही खुदाई की जाय तो नुकसान नहीं होता हैI खुदाई के बाद जब फसल प्राप्त कर लेते है, तो उसको सुखाना अति आवश्यक हैI सुखाई में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फलियों की सुखाई पेड़ो की छाया में करें धुप में धुप में सुखाने पर जमाव प्रतिशत कम हो जाता है यदि पेड़ों की छाया नहीं है तो मूंगफली की तुड़ाई सांय 4 बजे के बाद छाया में करनी चाहिए जिससे जमाव प्रतिशत मूंगफली का कम न हो सकेI
मूंगफली की फसल तैयार होने के पश्चात उसका भण्डारण किस प्रकार करे?
मूंगफली की खुदाई के बाद फलियाँ को छाया में अच्छी तरह सुख कर ही भण्डारण करना चाहिए यदि गीली मूंगफली भण्डारण किया जाता है तो फलियाँ काले रंग की पड जाती है जो की खाने एवं बीज में प्रयोग करने हेतु अनुपयुक्त हो जाती हैI और यदि जो हम बाजार उनका विक्रय करते है तो उसकी गुणवत्ता ख़राब होने के कारण पैसे भी कम प्राप्त होते हैI

पैदावार

मूंगफली की फसल से प्रति हैक्टर कितनी उपज प्राप्त हो जाती है?

मूंगफली की उपज मौसम के आधार पर अलग अलग पाई जाती है खरीफ की फसल में उपज 25 से 30 कुन्तल प्रति हैक्टर होती हैं इसी प्रकार से जायद की फसल में उपज 28 से 30 कुन्तल प्रति हैक्टर प्राप्त होती हैI

तिल की खेती


परिचय

भारत में तिल की खेती पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु,महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश एवम उत्तर प्रदेश में की जाती हैI भारत के कुल उत्पादन 20 प्रतिशत उत्पादन अकेले गुजरात से होता हैI उत्तर प्रदेश में तिल की खेती मुख्यतः बुंदेलखंड के राकर भूमि में तथा मिर्जापुर, सोनभद्र, कानपुर, इलाहाबाद, फतेहपुर, आगरा एवम मैनपुरी में शुद्ध एवम मिश्रित रूप से की जाती हैI तिल की उत्पादकता बहुत ही कम है सघन पद्धतियाँ अपनाकर उत्पादन बढाया जा सकता हैI

जलवायु और भूमि

तिल की खेती के लिए किस प्रकार की जलवायु और भूमि की आवश्यकता पड़ती है?
तिल के लिए शीतोषण जलवायु उपयुक्त होती है मुख्यतः बरसात या खरीफ में इसकी खेती की जाती है यह बहुत ही ज्यादा बरसात या सूखा पड़ने पर फसल अच्छी नहीं होती हैI इसके लिए हल्की भूमि तथा दोमट भूमि अच्छी होती हैI यह फसल पी एच 5.5 से 8.2 तक की भूमि में उगाई जा सकती हैI फिर भी यह फसल बलुई दोमट से काली मिट्टी में भी उगाई जाती हैI

प्रजातियाँ

तिल की जो उन्नतशील प्रजातियाँ है उनके बारे में जाने किसान भाईयो को बताईये उन उन्नतशील प्रजातियों के बारे में?
तिल की कई प्रजातियाँ पाई जाती है जैसे की टाईप 4, टाईप12, टाईप13, टाईप78, शेखर, प्रगति, तरुण, कृष्णा, एवम बी.63 प्रजातियाँ हैI


खेत की तैयारी

फसल की तैयारी के लिए अपने खेतों की तैयारी किस प्रकार करनी चाहिए?
खेत की तैयारी के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा दो-तीन जुताई कल्टीवेटर या देशी हल से करके खेत में पाटा लगाकर भुरभुरा बना लेना चाहिएI इसके पश्चात ही बुवाई करनी चाहिएI 80 से 100 कुंतल सड़ी गोबर की खाद को आख़िरी जुताई में मिला देना चाहिएI

बीज बुवाई

तिल की फसल में बीज की मात्रा प्रति हेक्टेयर कितनी लगती है और बीज का शोधन हमारे किसान भाई किस प्रकार करे?
एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए तीन से चार किलोग्राम बीज पर्याप्त होता हैI बीज जनित रोगों से बचाव के लिए 2.5 ग्राम थीरम या कैप्टान प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधन करना चाहिएI
तिल की बुवाई किस समय और किस विधी द्वारा करनी चाहिए?
तिल की बुवाई का उचित समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई का दूसरा पखवारा माना जाता हैI तिल की बुवाई हल के पीछे लाइन से लाइन 30 से 45 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज को कम गहराई पर करते हैI

पोषण प्रबंधन

फसल में खाद एवम उर्वरको का प्रयोग कब करना चाहिए और कितनी मात्रा में करना चाहिए?
उर्वरको का प्रयोग भूमि परीक्षण के आधार पर करना चाहिएI 80 से 100 कुंतल सड़ी गोबर की खाद खेत तैयारी करते समय आख़िरी जुताई में मिला देना चाहिएI इसके साथ ही साथ 30 किलोग्राम नत्रजन, 15 किलोग्राम फास्फोरस तथा 25 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिएI रकार तथा भूड भूमि में 15 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिएI नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस,पोटाश एवम गंधक की पूरी मात्रा बुवाई के समय बेसल ड्रेसिंग में तथा नत्रजन की आधी मात्रा प्रथम निराई-गुडाई के समय खड़ी फसल में देना चाहिएI

जल प्रबंधन

सिंचाई प्रबंधन तिल की फसल में कब होना चाहिए किस प्रकार होना चाहिए इस बारे में बताईये?
वर्षा ऋतू की फसल होने के कारण सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती हैI यदि पानी न बरसे तो आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिएI फसल में 50 से 60 प्रतिशत फलत होने पर एक सिंचाई करना आवश्यक हैI यदि पानी न बरसे तो सिंचाई करना आवश्यक होता है

खरपतवार प्रबंधन

तिल की फसल में निराई-गुडाई कब करनी चाहिए और खरपतवारों के नियंत्रण हेतु क्या उपाय करने चाहिए?
किसान भाईयो प्रथम निराई-गुडाई बुवाई के 15 से 20 दिन बाद दूसरी 30 से 35 दिन बाद करनी चाहिएI निराई-गुडाई करते समय थिनिंग या विरलीकरण करके पौधों के आपस की दूरी 10 से 12 सेंटीमीटर कर देनी चाहिएI खरपतवार नियंत्रण हेतु एलाक्लोर50 ई.सी. 1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर बुवाई के बाद दो-तीन दिन के अन्दर प्रयोग करना चाहिएI

रोग प्रबंधन

रोगों पर नियंत्रण हमें कैसे करना चाहिए इस पर जानकारी दे रहे है?
इसमे तिल की फिलोड़ी अवम फाईटोप्थोरा झुलसा रोग लगते हैI फिलोड़ी की रोकथाम के लिए बुवाई के समय कूंड में 10जी. 15 किलोग्राम या मिथायल-ओ-डिमेटान 25 ई.सी 1 लीटर की दर से प्रयोग करना चाहिए तथा फाईटोप्थोरा झुलसा की रोकथाम हेतु 3 किलोग्राम कापर आक्सीक्लोराइड या मैन्कोजेब 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से आवश्यकतानुसार दो-तीन बार छिडकाव करना चाहिएI

कीट प्रबंधन

कौन-कौन से कीट तिल की फसल में लग सकते है और उनका नियंत्रण हमें किस प्रकार करना चाहिए?
तिल में पत्ती लपेटक अवम फली बेधक कीट लगते हैI इन कीटों की रोकथाम के लिए क्यूनालफास 25 ई.सी. 1.5 लीटर या मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के दर से छिडकाव करना चाहिएI

फसल कटाई

तिल की फसल की कटाई एवम मड़ाई का सही समय क्या है कब करनी चाहिए?
तिल की पत्तियां जब पीली होकर गिरने लगे तथा पत्तियां हरा रंग लिए हुए पीली हो जावे तब समझना चाहिए की फसल पककर तैयार हो गयी हैI इसके पश्चात कटाई पेड़ सहित नीचे से करनी चाहिएI कटाई के बाद बण्डल बनाकर खेत में ही जगह जगह पर छोटे-छोटे ढेर में खड़े कर देना चाहिएI जब अच्छी तरह से पौधे सूख जावे तब डंडे छड आदि की सहायता से पौधों को पीटकर या हल्का झाड़कर बीज निकाल लेना चाहिएI

पैदावार

तिल की फसल से लगभग प्रति हेक्टेयर कितनी पैदावार हमें प्राप्त हो जाती है?

तकनीकी तरीको से खेती करने पर तिल की पैदावार 7 से 8 कुन्तल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती हैI

अलसी की खेती


परिचय

अलसी की खेती उत्तर एवम मध्य भारत में अच्छी तरह से की जाती है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड भाग में अच्छी खेती की जाती है। अलसी के बीज से तेल निकालते है तेल से साबुन भी बनाया जाता है। इसके पौधे से रेशा निकला जाता है रेशे से कपडे एवम अच्छी गुणवत्ता वाले पेपर बनाये जाते है।

जलवायु और भूमि

अलसी की खेती के लिए किस प्रकार की जलवायु और भूमि की आवश्यकता होती है?
इसकी खेती के लिए सम-शीतोषण जलवायु पाई जाती है तथा इसकी बुवाई के समय 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तापक्रम होना चाहिए अलसी की खेती मटियार भूमि में अच्छी तरह से की जाती है इसके साथ-साथ दोमट एवम चिकनी मिट्टी में भी की जा सकती है।

प्रजातियाँ

अलसी में कौन-कौन उन्नतशील प्रजातियाँ है इस बारे में बताइये?
दो प्रकार की प्रजातियाँ पाई जाती है एक बीज बहु-उद्देशीय इन प्रजातियों में तेल की मात्रा अधिक पाई जाती है जो की इस प्रकार है- गरिमा, श्वेता, शुभ्रा, पदमिनी, शेखर, शारदा, लक्ष्मी27 एवम मधु आजाद1 प्रजाति है। रेशे की मात्रा इन प्रजातियों में अधिक पाई जाती है जैसा की गौरव, शिखा, रश्मि और पार्वती प्रजातियाँ है।

खेत की तैयारी

अलसी की खेती के लिए खेत की तैयारी किस प्रकार करे?
अलसी की खेती खरीफ की फसल् की कटाई के बाद ही की जाती है। खरीफ की फसल के बाद पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए बाद में कल्टीवेटर या देशी हल से दो-तीन जुताइयां करके अच्छी तरह से समतल खेत को कर लेना चाहिए इसके साथ ही साथ पाटा लगाकर भुरभुरा बना लेते है।

बीज बुवाई

अलसी की खेती हेतु जो बीज की दर है वो प्रति हेक्टेयर कितनी लगती है और उन बीजो का शोधन किस प्रकार करे?
बीज उददेशीय किस्मो में 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा लगती है। दो-उददेशीय में 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा लगती है। झुलसा तथा उकठा से संक्रमण की रोकथाम हेतु 2.5 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधित कर लेना चाहिए इसके पश्चात ही बुवाई करे।
अलसी की खेती के लिए बुवाई हम कब करे और किस विधि का प्रयोग करे उसमे?
अलसी की बुवाई उचित समय सम्पूर्ण अक्टूबर माह है। इसकी बुवाई लाइनों में हल के पीछे कूंड में की जाती है। बीज उददेशीय हेतु लाइन से लाइन की दूरी 25 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। दो-उददेशीय प्रजातियों हेतु लाइन से लाइन की दूरी 20 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।

पोषण प्रबंधन

अलसी की फसल में किन-किन उर्वरको का प्रयोग हमें करना है और कब करना है कितनी मात्रा में करना है?
असिंचित क्षेत्रों हेतु नत्रजन 50 किलोग्राम, फास्फोरस 40 किलोग्राम, पोटाश 40 किलोग्राम तथा सिंचित क्षेत्रों हेतु नत्रजन 100 किलोग्राम, फास्फोरस 60 किलोग्राम, पोटाश 40 किलोग्राम की आवश्यकता पड़ती है। असिंचित दशा में नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश की पूरी मात्रा तथा सिंचित दशा में नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस व् पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय कूंड में 2-3 सेंटीमीटर बीज के नीचे देना चाहिए तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा सिंचित दशा में टॉप ड्रेसिंग में देते है।

जल प्रबंधन

अलसी की फसल में हमें कब सिंचाई करनी चाहिए और कितनी मात्रा में करनी चाहिए?
अलसी प्रायः असिंचित दशा में बोते है लेकिन जहाँ पर सिंचाई की सुविधा होती है वहां दो सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। पहली फूल आने पर तथा दूसरी सिंचाई दाना बनाते समय करने से उपज में बढोत्तरी होती है।

खरपतवार प्रबंधन

अलसी की फसल में खरपतवारों के नियंत्रण के लिए किस तरह के उपाय करे?
इसमे रबी की फसल के सभी खरपतवार उगते है। इनका नियंत्रण पेंडीमेथालीन 30 ई.सी. 3.3 लीटर मात्रा 800 से 1000 लीटर पानी में मिलाकर फ़्लैटफैन नोजिल से बुवाई के बाद एक या दो दिन के अन्दर छिडकाव करना चाहिए जिससे की खरपतवारों का जमाव न हो सके।

रोग प्रबंधन

अलसी में कौन-कौन से रोग लगते हैं और इस हेतु क्या उपाय करने चाहिए?
इसमे अल्टरनेरिया झुलसा, रतुआ या गेरुई, उकठा एवम बुकनी रोग लगता है। इसकी रोकथाम के लिए 2.5 ग्राम थीरम से बीज का उपचार प्रति किलोग्राम की दर से कर लेना चाहिए बुवाई नवम्बर में करे तो रोग कम लगते है, रोग रहित प्रजातियों की बुवाई करनी चाहिए। खादी फसल में मैन्कोजेब 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 40-50 दिन बुवाई के बाद छिडकाव करे तथा हर 15 दिन के अन्तराल पर छिडकाव करते रहना चाहिए जिससे की रोग न लग सके। रतुआ या गेरुई तथा बुकनी रोग की रोकथाम के लिए घुलनशील गंधक 3 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करना चाहिए। उकठा की रोकथाम हेतु दीर्घ कालीन फसल चक्र भी अपनाना चाहिए।

कीट प्रबंधन

कीट कौन-कौन से लगते है अलसी की फसल में और उनका नियंत्रण हमारे किसान भाई किस प्रकार से करे?
अलसी में गालमिज् कीट लगता है इसके प्रौढ़ कीट गहरे नारंगी रंग के छोटी मक्खी होती है। इसकी रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी. 750 मिलीलीटर या क्युनालफास 1.5 लीटर मात्रा 800 से 1000 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करना चाहिए।

फसल कटाई

अलसी की फसल की कटाई और मड़ाई का सही समय क्या है इसकी कटाई और मड़ाई हमारे किसान भाई कब करे कैसे करे?
जब फसल पूर्ण रूपेण सूखकर पाक जावे तभी कटाई करनी चाहिए। कटाई के तुरंत बाद मड़ाई कर लेनी चाहिए जिससे की बीजों का नुकसान न हो।

पैदावार

अलसी की फसल में प्रति हेक्टेयर कितनी उपज प्राप्त होने की संभावना होती है?

अलग-अलग प्रजातियों की पैदावार अलग-अलग होती है प्रथम बीज उद्देशीय सिंचित दशा में 18 से 20 कुंतल प्रति हेक्टेयर तथा असिंचित दशा में 12 से 15 कुंतल प्रति हेक्टेयर एवं तेल दोनों दशा में 42 से 45 प्रतिशत पाया जाता है। दो-उद्देशीय दशा में 20 से 22 कुंतल प्रति हेक्टेयर तथा 12 से 15 प्रतिशत तेल एवम 40 से 42 प्रतिशत तक रेशा पाया जाता है।

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